उन आँखों में हमेशा एक इंतज़ार था
बेकद्री मुझमें थी उनमें तो सिर्फ प्यार था
अपना बनाने को, क्या-क्या ने किया उसने
मैं जा रहा था दूर, उसको फिर भी ऐतबार था |
उन आँखों में आंसूं रुक-रुक कर आतें थे
कहतें ना लब जिनकों वो सब कह जातें थे
था कर रहा नादानी मैं एक अनजान बनकर
वो हल्कें से आंसूं बिना दर्द के घाव दे जातें थे |
उन आँखों में विश्वास हर पल झलकता था
मेरी गलती पर भी प्यार भर-भर छलकता था
मेरे चारों और बना लेता वो एक अजीब सी दुनिया
जिसमें हर रंग का फूल हर वक्त महकता था ||
बहुत ही खूबसूरत कविता लिखी है सर !!!
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