ना जाने कैसी किश्ती में सवार ये नयनो की डोली
मूक बनी जाने कैसे करती है मनवा की बोली |
कैसे कैसे रूप सजती आँखें मधुमय ये मतवाली
श्रृंगार से कभी ये भरी हुई विरह में है कभी खाली |
प्रेम वर्षा इन नयनों की हल्की हल्की फुह्वारों सी
मन को शीतल कर देती है तन को लगती अंगारों सी |
कही प्रीत का धागा है बाँधा कही जोड़ी रिश्तों की डोरी
नयनों के नित प्रहार बिना नयनों की मस्ती है कोरी |
Deep... Beauty in CONTRAST.
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