मैं शांत सागर खुश था अपने खारे पानी में
ना जाने क्यों किसी के नोका ने लहरें बना दी |
मैं प्रतीक्षा कर रहा था अपने छितिज अन्त की
ना जाने क्यों किसी ने जल्द ही सज़ा दी |
मैं कहना चाहता था मत उतरो इस विशाल सागर में
ना जाने क्यों किसी ने अपनी नोका ही गवां दी |
मैं नहीं जानता कोई और भी डूबेगा इधर आकार
ना जाने क्यों मैंने अपनी लहरे ही भुला दी |
sir jee i am very impress to read your poet.
ReplyDeletethanks
arvind